सरपंच का 'पंच' (मुक्का) अब गांवों के सरकारी स्कूलों पर नहीं चलेगा, क्योंकि ग्रामीण शिक्षा विकास कमेटी (पसवक) जोकि गांवों में खुले सरकारी स्कूलों का संचालन करती थीं, का अब स्कूलों से वर्चस्व समाप्त होने जा रहा है। साथ ही समाप्त हो जाएगी स्कूलों से राजनीतिक दखलंदाजी, क्योंकि पहले पसवक का चेयरमैन गांव का सरपंच होता था और गांव के स्कूलों के संचालन में गांव के पंच उसे सहयोग करते थे। लेकिन अब 31 मार्च से पसवक व शहरी स्कूल विकास कमेटी (शसवक) को भग कर स्कूल प्रबंधन कमेटियों का गठन किया जा रहा है, इनमें केवल बच्चों के अभिभावक ही शामिल किए जाएंगे।
ऐसी व्यवस्था शिक्षा के अधिकार (आरटीइ) कानून-2009 तहत की जा रही है। स्कूल प्रबंधक कमेटियों का गठन करने के संबंध में जिले के सारे सीनियर सेकेंडरी, हाई, मिडिल और प्राइमरी स्कूलों के प्रमुखों को पत्र और हिदायतें जारी कर दी गई है। जिला शिक्षा अधिकारी (डीइओ) संदीप धूड़िया ने बताया कि राइट टू एजुकेशन एक्ट -2009 की धारा 21 और पंजाब राइट ऑफ चिल्ड्रन टू फ्री एंड कंप्लसरी एजुकेशन रूल्स-2011 के नियम 13 के अनुसार प्रत्येक स्कूल के लिए पहले से चल रही पसवक और शसवक के स्थान पर स्कूल प्रबंधन कमेटिया गठित की जाएंगी। उन्होंने बताया कि एक अप्रैल 2012 से नई स्कूल प्रबंधन कमेटी का गठन करना जरूरी होगा। चाहे वह स्कूल प्राइमरी, मिडिल, हाई या सेकेंडरी स्तर का क्यों न हो। नई गठित होने वाली कमेटियों में तालमेल रखने के लिए सदस्यों की कुल संख्या 12 होगी, इनमें से नौ सदस्य बच्चों के अभिभावकों में से लिए जाएंगे। इनमें पाच महिला और चार पुरुष होने जरूरी है। इनमें से एक सदस्य स्थानीय पंचायत या कमेटी, एक स्कूल अध्यापकों में से और एक शिक्षा माहिर या स्कूल के विद्यार्थियों में से लिया जाएगा। इसके अलावा स्कूल का सबसे सीनियर अध्यापक अपने पद के तौर पर सदस्य होगा पर उसे वोट का अधिकार नहीं होगा। स्कूल प्रबंधक कमेटियों के चेयरमैन और उप चेयरमैन बच्चों के अभिभावकों में से नियुक्त किए जाएंगे। पहले काम कर रही पसवक और शसवक 31 मार्च तक अपना काम पूरा करके भंग हो जाएंगी। बता दें कि दैनिक जागरण दो सप्ताह पहले ही इस बात का खुलासा कर दिया था।